January 4, 2026
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नारी! तुमने अपने जीवन को,
संघर्षो से ही सींचा है!
नारी! तुमने अपने जीवन को,
संघर्षो से ही सींचा है!
अपने स्वपनो को छोड़ इधर,
पति के स्वपनो को पाला है!
ये अदभुद कृति है इश्वर की,
करुणा, वात्सल्य की खान रही,
भगवान को भी धरती पर लाने वाली,
नारी! तुम भगवान की भी भगवान रही!
अपने जीवन को स्वयं सदा,
दान पत्र पर रखा है!
जैसे मानो संधि पत्रों पर,
हस्ताक्षर कर रखा है!
माता, भगिनी, पुत्री, पत्नी,
ये सब तेरे रूप रहे!
संकल्प पालने मे तुमने,
निजआगे कर्तव्य रखे,
तेरे इस विशाल ह्रदय के कारण,
मस्तक भी झुक जाते है,
जितना लिखना चाहू लेकिन,
शब्द ही छोटे पड़ जाते है!
बृजेश कुमार


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