अपने बचपन में हमने देखे हैं साक्षात असली दौलत वाले लोग!
अब तो कंकड जेब में भरकर और तिजोरियों में पत्थर, असली गरीब लोगों से भर गयी है दुनिया।
असली दौलत वाले वो लोग जितने ज्यादा पैसों से गरीब होते थे उतने ही दिल से अमीर होते थे।
वो पानी के छींटों से ठंडी की हुयी धरती पर इतनी चैन की नींद सोते थे कि वैसा चैन तो अब मखमली आलिशान बिस्तर पर सोने वालों को भी नसीब नहीं होता ।
वो जितना मिल जाए उसी में खुश रहते थे और अब जितना भी मिल जाए खुशी की एक बूंद नहीं किसी के जीवन में ।
जेब खाली और दिल से अमीर, साइकिल पर मिलों चलकर आने पर भी मुस्करा कर मिल लिया करते थे,
और जीवन भर भी साइकिल चलाकर भी असंतुष्ट नहीं होते थे।
उनकी खुशियों की परिभाषा ही कुछ और होती थी।
वो सबको मुस्कराता देख कर जीने वाले इंसान थे, अब तो ऐसे इंसान मिलते ही नहीं।
असली दौलत तो हम होते हैं, हम का अर्थ है हमारे
इससे कीमती क्या है कि अपनों की दौलत से , उनके चेहरे की खुशी इससे ज्यादा कुछ कीमती नहीं होता।
पहले के लोगों में एक संतुष्टि का भाव होता था, अब व्यक्ति केवल और केवल असंतुष्ट ही है। अगर कोई एक इच्छा पूरी हो भी जाए तो अगले ही पल कोई नयी इच्छा जन्म ले लेती है


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