प्रस्तावना छब्बीस जनवरी हमारे स्वाभिमान का सूर्योदय
अक्सर हम छब्बीस जनवरी को केवल कैलेंडर की एक लाल तारीख या एक राष्ट्रीय अवकाश मान लेते हैं। लेकिन क्या हमने कभी गहरे विचार के साथ सोचा है कि यदि यह दिन न होता, तो आज हमारा जीवन कैसा होता? छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास वह ऐतिहासिक दिन था जब भारत ने अपनी नियति अपने हाथों में ली थी। सदियों की लंबी गुलामी के बाद, जब हमने अपना संविधान लागू किया, तो वह केवल कागजों का संकलन नहीं था, बल्कि वह तैंतीस करोड़ हिंदुस्तानियों के सपनों की सामूहिक उड़ान थी।
गणतंत्र का अर्थ अत्यंत सरल है, एक ऐसा शासन जहाँ जनता ही सर्वोपरि है। इसका अर्थ यह है कि देश की सबसे बड़ी आसंदी पर बैठा व्यक्ति भी आपके द्वारा निर्धारित नियमों और मर्यादाओं से बंधा है। इस अंक के माध्यम से हम इस उत्सव की गहराई में उतरेंगे और यह समझेंगे कि यह दिन केवल सैन्य प्रदर्शन देखने का नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन में झांकने का है। क्या हम उस आज़ादी और उस गणतंत्र का सम्मान कर पा रहे हैं, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अनगिनत यातनाएं सही थीं?
अमर शहीदों की विरासत नींव के वे पत्थर
वतन की रेत मुझे एड़ियाँ रगड़ने दे, मुझे यकीन है जल यहीं से निकलेगा। जब हम गणतंत्र की बात करते हैं, तो हमें उन महान बलिदानों को स्मरण करना होगा जिन्होंने इस मार्ग को निष्कंटक बनाया। याद कीजिए शहीद भगत सिंह को, जिन्होंने मात्र तेईस वर्ष की अल्पायु में फाँसी के फंदे को चूम लिया था। उनके पास विकल्प था कि वे क्षमा मांग लें, लेकिन उन्होंने मृत्यु को वरण किया ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वाभिमान के साथ जीवित रह सकें।
इतिहास के पृष्ठों में हम कुछ बड़े नाम पढ़ते हैं, लेकिन गणतंत्र की असली ईंटें वे लाखों गुमनाम लोग हैं जिनका नाम कहीं अंकित नहीं हुआ। वह माँ जिसने अपने एकमात्र पुत्र को रणभूमि में भेज दिया, वह पत्नी जिसने अपने सौभाग्य का बलिदान दे दिया, और वह पिता जिसने अपने युवा पुत्र के पार्थिव देह को तिरंगे में लिपटा देखा, इन सबका त्याग हमारे गणतंत्र का आधार है। आज जब हम भ्रष्टाचार करते हैं या नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो हम अनजाने में इन शहीदों के बलिदान का अनादर कर रहे होते हैं। देशप्रेम का अर्थ केवल सीमाओं पर लड़ना नहीं है, बल्कि एक निष्ठावान नागरिक बनकर राष्ट्र को शक्तिशाली बनाना भी है।
सैन्य पराक्रम पर्वत से ऊँचा बलिदान
जब हम रात्रि में अपने परिवारों के साथ सुरक्षित निद्रा का आनंद ले रहे होते हैं, तब सीमा पर कोई शून्य से नीचे के तापमान में बर्फीली चोटियों पर अडिग खड़ा होता है। कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस का परिचय देने वाले वीरों की गाथाएं हमारे गणतंत्र की रक्षा की सबसे बड़ी मिसाल हैं। एक वीर योद्धा ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मुस्कुराते हुए कहा था कि तिरंगा फहराने का सुख मृत्यु के भय से कहीं विशाल होता है।
उन्होंने अपने एक कनिष्ठ साथी को बचाने के लिए स्वयं को शत्रु की गोलियों के सम्मुख कर दिया। उनका यह सर्वोच्च बलिदान हमें निरंतर यह स्मरण कराता है कि गणतंत्र की रक्षा के लिए आज भी हमारे सैन्य बल अपना वर्तमान न्योछावर कर रहे हैं। हमें अपने जीवन में कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि हम उनके इस त्याग का मूल्य समझें और देश के भीतर वैमनस्य और अस्वच्छता न फैलने दें। राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारी केवल नारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि वह हमारे आचरण में प्रतिबिंबित होनी चाहिए।
साझी शहादत और एकता का अटूट सपना
हमारे देश को विभाजित करने के षड्यंत्र सदियों से होते रहे हैं, लेकिन हमारे गणतंत्र की सबसे सुंदर विशेषता विविधता में एकता है। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसी अनेक मित्रताएं हैं जो इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं। जब विभिन्न मतों और संप्रदायों के लोग भारत माता की मुक्ति के लिए एक-दूसरे का हाथ थामकर फाँसी के तख्ते की ओर बढ़ते थे, तो उनका उद्देश्य केवल एक स्वतंत्र और अखंड भारत था।
मृत्यु से पूर्व उन्होंने यही कामना की थी कि उनकी राख को वतन की मिट्टी में मिला दिया जाए। उन सभी का रक्त एक ही रंग का था और स्वप्न भी साझा था, एक ऐसा भारत जहाँ हर पंथ के लोग मिलकर एक परिवार की तरह रहें। आज जब हम संकीर्ण विचारधाराओं के नाम पर विवाद करते हैं, तो हम उस साझी शहादत का अपमान करते हैं। हमें अपने हृदयों से नफरत की दीवारें गिरा देनी चाहिए क्योंकि एकता ही वह सूत्र है जो एक विशाल गणतंत्र को बांधकर रखता है।
संवैधानिक दूरदर्शिता हर हाथ में शक्ति
गणतंत्र की वास्तविक शक्ति हमारा संविधान है। जब इसे तैयार किया गया, तो सबसे प्रधान विचार समानता का था। एक ऐसी व्यवस्था निर्मित की गई जहाँ एक निर्धन व्यक्ति की संतान भी अपनी योग्यता के बल पर देश के सर्वोच्च पद तक पहुँच सकती है। संविधान हमें मतदान की शक्ति देता है। यह मत केवल एक चिह्न नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र का भविष्य लिखने की लेखनी है।
संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है और हमें विधि की दृष्टि में समान रखता है। लेकिन अधिकार सदैव कर्तव्यों के साथ आते हैं। यदि हमें स्वच्छ मार्ग चाहिए, तो हमें कचरा न फैलाने का कर्तव्य भी निभाना होगा। यदि हमें सुरक्षा चाहिए, तो हमें नियमों का अनुपालन भी करना होगा। वास्तविक गणतंत्र तब चरितार्थ होता है जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों को अपने अधिकारों से उच्च स्थान देने लगता है।
भारत की वैश्विक धमक और भविष्य का संकल्प
आज का भारत प्रगति के पथ पर तीव्रता से अग्रसर है। आज हम विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित हैं। आज जब भारत वैश्विक मंचों पर अपनी बात रखता है, तो संपूर्ण विश्व उसे ध्यानपूर्वक सुनता है। अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर तकनीकी विकास तक, भारत अब आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। चाहे वह वैश्विक महामारी के समय अन्य देशों की सहायता करना हो या पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नेतृत्व करना, भारत एक विश्व मित्र के रूप में स्थापित हो रहा है।
हमारी डिजिटल क्रांति आज पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन चुकी है। ग्राम के एक लघु व्यवसायी से लेकर महानगरों तक, हर स्थान पर आधुनिक तकनीक का समावेश हो रहा है। लेकिन इस उन्नति का वास्तविक लाभ तब है जब यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। गणतंत्र तब सफल माना जाएगा जब हमारे देश का कोई भी शिशु क्षुधा से पीड़ित न हो और हर हाथ को सार्थक कार्य प्राप्त हो। विकास की किरणें जब झोपड़ी तक पहुँचेंगी, तभी स्वतंत्रता के दीप प्रज्वलित होंगे।
उपसंहार आपकी प्रतिज्ञा ही राष्ट्र की सामर्थ्य है
अंत में, मैं समस्त पाठकों से एक प्रश्न करना चाहता हूँ कि आपने इस वर्ष अपने राष्ट्र को क्या प्रदान किया? गणतंत्र दिवस पर केवल व्याख्यान देना या सुनना पर्याप्त नहीं है। हमें अपने दैनिक आचरण में सूक्ष्म किंतु सार्थक परिवर्तन लाने होंगे। क्या हम जल का अपव्यय रोक सकते हैं? क्या हम यातायात के नियमों का पूर्ण निष्ठा से पालन कर सकते हैं? क्या हम अपने बच्चों को शुचिता और भ्रातृत्व का संस्कार दे सकते हैं?
स्मरण रखिए, राष्ट्रीय ध्वज केवल स्तंभों पर फहराने के लिए नहीं होता, उसे अपने चरित्र में आत्मसात करना होता है। इस छब्बीस जनवरी को आइए हम एक संकल्प लें कि हम केवल जनता बनकर नहीं रहेंगे, बल्कि जागरूक नागरिक बनेंगे। क्योंकि सजग नागरिकों से ही एक महान राष्ट्र का निर्माण होता है और आपकी व्यक्तिगत उन्नति ही भारत की सामूहिक प्रगति है।
जय हिन्द। जय भारत।
आपका संपादक


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