प्रश्न 1. सिद्धों की कुल संख्या 84 मानी गई है। इस संख्या का सबसे पहला प्रामाणिक उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है?
A) राहुल सांकृत्यायन कृत हिंदी काव्यधारा
B) ज्योतिरीश्वर ठाकुर कृत ‘वर्णरत्नाकर’
C) आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत हिंदी साहित्य का इतिहास
D) सरहपा कृत ‘दोहाकोश’
उत्तर: B) ज्योतिरीश्वर ठाकुर कृत ‘वर्णरत्नाकर’
व्याख्या:
सिद्धों की संख्या 84 होने का सबसे पहला और प्राचीनतम उल्लेख मैथिली कवि ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा 14वीं शताब्दी में रचित गद्य ग्रंथ वर्णरत्नाकर में मिलता है। बाद में महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत के विशाल तिब्बती साहित्य भंडार से खोजबीन करके इन 84 सिद्धों के नामों और उनकी रचनाओं को अपने ग्रंथ ‘हिंदी काव्यधारा’ (1944) के माध्यम से हिंदी जगत के सामने सप्रमाण प्रस्तुत किया। ‘वर्णरत्नाकर’ की प्रामाणिकता इस विषय में सर्वोपरि मानी जाती है।
प्रश्न 2. बौद्ध धर्म की किस विकृति या उपशाखा से सिद्ध साहित्य का आविर्भाव हुआ?
A) हीनयान
B) महायान
C) वज्रयान (सहजयान)
D) सौत्रांतिक
उत्तर: C) वज्रयान (सहजयान)
व्याख्या:
महात्मा बुद्ध के मूल उपदेशों के बाद बौद्ध धर्म कालांतर में ‘हीनयान’ और ‘महायान’ में विभाजित हुआ। महायान आगे चलकर ‘मंत्रयान’ और फिर ‘वज्रयान’ के रूप में विकृत हुआ। वज्रयान में तंत्र-मंत्र, वामाचार, जादू-टोना और महासुखवाद (पंचमकार) का प्रवेश हो गया। इसी वज्रयान शाखा के साधकों को ‘सिद्ध’ कहा गया और इनके द्वारा रचित साहित्य ही ‘सिद्ध साहित्य’ कहलाया। वज्रयान का ही आगे का सहज रूप ‘सहजयान’ बना, जिसके प्रवर्तक सरहपा माने जाते हैं।
प्रश्न 3. सिद्धों की भाषा को ‘संधा भाषा’ (या संध्या भाषा) नाम देने वाले विद्वान कौन हैं?
A) अद्वयवज्र तथा मुनिदत्त
B) हरप्रसाद शास्त्री
C) राहुल सांकृत्यायन
D) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
उत्तर: A) अद्वयवज्र तथा मुनिदत्त
व्याख्या:
सिद्धों की भाषा को ‘संधा भाषा’ नाम अद्वयवज्र तथा मुनिदत्त ने दिया था। ‘संधा’ शब्द का अर्थ है – ऐसी भाषा जिसमें अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों को प्रतीकात्मक शैली में व्यक्त किया गया हो, जिसका कुछ हिस्सा स्पष्ट हो और कुछ रहस्यमयी (जैसे शाम का धुंधलका या संधिकाल)। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे ‘अन्तर्मुख साधना की प्रतीक भाषा’ कहा है। हरप्रसाद शास्त्री ने सिद्धों की वाणियों का संग्रह ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ नाम से निकाला था, लेकिन नामकरण का श्रेय मूल टीकाकारों को जाता है।
प्रश्न 4. “ससतर बक्खणइ अइअ सयल वि पसंथई।“ (शास्त्रों की व्याख्या करने वाले मूर्ख हैं) — यह तीखा आक्षेप किस सिद्ध कवि का है?
A) शबरपा
B) लुइपा
C) सरहपा
D) कण्णपा
उत्तर: C) सरहपा
व्याख्या:
यह प्रसिद्ध पंक्ति सिद्ध सरहपा की है। सरहपा को सिद्ध साहित्य का प्रथम कवि माना जाता है (समय: 769 ईस्वी)। उन्होंने तत्कालीन ब्राह्मणवाद, रूढ़िवादिता, बाह्याचारों और केवल किताबी ज्ञान (शास्त्रों) पर तीखा प्रहार किया। वे कहते हैं कि जो लोग केवल शास्त्रों की व्याख्या करते हैं, वे सत्य से दूर हैं, क्योंकि ब्रह्म या सहज रूप तो स्वयं के भीतर है, उसे किताबी ज्ञान से नहीं जाना जा सकता।
प्रश्न 5. सिद्ध साहित्य में प्रयुक्त होने वाले ‘महासुखवाद’ (महासुह) का दार्शनिक अर्थ क्या है?
A) शारीरिक भोग-विलास की चरम पराकाष्ठा
B) शून्य और विज्ञान का समरसता रूप, जिसमें आत्मा-परमात्मा का भेद मिट जाता है
C) संसार का त्याग करके शून्य में विलीन हो जाना
D) हठयोग के द्वारा कुंडलिनी जाग्रत करना
उत्तर: B) शून्य और विज्ञान का समरसता रूप, जिसमें आत्मा-परमात्मा का भेद मिट जाता है
व्याख्या:
सिद्ध दर्शन में ‘महासुखवाद’ एक अत्यंत गूढ़ अवस्था है। वज्रयानियों के अनुसार, जब साधक की प्रज्ञा (ज्ञान) और उपाय (करुणा) का मिलन होता है, तब ‘शून्य’ और ‘विज्ञान’ एक हो जाते हैं। इस समरसता की स्थिति में साधक को जो आनंद प्राप्त होता है, उसे ही ‘महासुख’ कहा गया है। यद्यपि बाह्य रूप में इसके लिए स्त्री-संसर्ग (डोम्बी, शबरी आदि के प्रतीक) को माध्यम बनाया गया, जिससे इसमें विकार आया, परंतु आध्यात्मिक स्तर पर यह द्वैत भाव की समाप्ति और अद्वैत की स्थिति है।
प्रश्न 6. सिद्धों के विषय में कौन सा कथन असत्य (त्रुटिपूर्ण) है?
A) सिद्धों में ‘पा’ (पाद) शब्द आदरसूचक के रूप में नाम के पीछे लगाया जाता था।
B) सिद्धों की साधना पद्धति में नारी का सहवास अनिवार्य माना जाता था, जिसे वे ‘मुद्रा’ कहते थे।
C) साधना अवस्था में सिद्धों का मुख्य केंद्र ‘श्रीपर्वत’ रहा है।
D) सिद्धों ने ईश्वरवाद का घोर समर्थन किया और वे वेदों के परम अनुयायी थे।
उत्तर: D) सिद्धों ने ईश्वरवाद का घोर समर्थन किया और वे वेदों के परम अनुयायी थे।
व्याख्या:
यह कथन पूर्णतः असत्य है। सिद्ध मूलतः बौद्ध धर्म की विकृत शाखा से थे, इसलिए वे अनीश्वरवादी और वेद-विरोधी थे। उन्होंने वैदिक कर्मकांडों, वर्ण व्यवस्था और ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता का कड़ा विरोध किया। विकल्प A, B और C पूरी तरह सही हैं। सिद्धों की साधना पीठ ‘श्रीपर्वत’ (आंध्र प्रदेश) थी, वे अपने नाम के पीछे ‘पा’ आदर के लिए लगाते थे (जैसे सरहपा, शबरपा), और उनकी पद्धति में तांत्रिक ‘योगिनी’ या ‘मुद्रा’ (नारी) का होना अनिवार्य अंग था।
प्रश्न 7. सिद्ध मत में ‘चर्यापद’ से क्या तात्पर्य है?
A) सिद्धों द्वारा गाए जाने वाले तांत्रिक गीत जो अनुष्ठानों के समय गाए जाते थे।
B) सिद्धों के दार्शनिक सिद्धांतों की गद्य पुस्तकें।
C) सिद्धों द्वारा प्रयुक्त होने वाले योगासनों की सूची।
D) दीक्षा के समय शिष्यों को दी जाने वाली प्रतिज्ञाएं।
उत्तर: A) सिद्धों द्वारा गाए जाने वाले तांत्रिक गीत जो अनुष्ठानों के समय गाए जाते थे।
व्याख्या:
सिद्ध साहित्य दो रूपों में मिलता है — ‘दोहाकोश’ और ‘चर्यापद’। दोहाकोश में सिद्धों के मतों का खंडन-मंडन और उपदेशात्मक बातें हैं, जबकि ‘चर्यापद’ सिद्धों के वे गीत हैं जो तांत्रिक अनुष्ठानों, साधनाओं या चर्या के समय गाए जाते थे। चर्यापद प्रायः राग-रागिनियों में बंधे होते हैं और इनमें संधा भाषा (प्रतीकात्मक भाषा) का गहरा प्रयोग होता है। चर्यापदों का संपादन महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने किया था।
प्रश्न 8. 84 सिद्धों में किस सिद्ध का स्थान साधना और उच्च कोटि की रहस्यभावना की दृष्टि से सबसे सर्वोच्च (ऊंचा) माना जाता है?
A) सरहपा
B) कण्णपा
C) लुइपा
D) डोम्भिपा
उत्तर: C) लुइपा
व्याख्या:
सिद्धों में सबसे पुराने और प्रथम सिद्ध भले ही सरहपा हों, परंतु साधना की उच्चता और रहस्य भावना की दृष्टि से लुइपा का स्थान 84 सिद्धों में सबसे ऊंचा माना जाता है। राजा दारीकपा और उनके मंत्री डेंगीपा इनके शिष्य बन गए थे। उड़ीसा के तत्कालीन राजा और सामंत भी इनके प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। इनकी कविता में दर्शन और साधना का अत्यंत गूढ़ और गंभीर रूप मिलता है।
प्रश्न 9. “काआ तरुवर पंच विडाल। चंचल चीए पइठो काल।“ — इस अत्यंत प्रसिद्ध पंक्ति के रचयिता कौन हैं?
A) सरहपा
B) लुइपा
C) शबरपा
D) कण्णपा
उत्तर: B) लुइपा
व्याख्या:
यह सिद्ध साहित्य की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में से एक है, जिसकी रचना लुइपा ने की है। इसका अर्थ है: यह शरीर (काया) एक वृक्ष (तरुवर) के समान है, जिसकी पांच इंद्रियां रूपी पांच डालियां (पंच विडाल) हैं। चंचल चित्त के कारण ही इसमें ‘काल’ (मृत्यु या विकार) प्रवेश करता है। इसमें काया साधना और चित्त की चंचलता को रोकने का संदेश दिया गया है।
प्रश्न 10. सिद्ध कण्णपा के संदर्भ में कौन सा तथ्य सही नहीं है?
A) वे 84 सिद्धों में पांडित्य और कवित्व की दृष्टि से सबसे अग्रणी माने जाते हैं।
B) इनका जन्म कर्नाटक के एक ब्राह्मण वंश में हुआ था और इनकी साधना बिहार के सोमपुरी विहार में हुई थी।
C) इनकी रचनाओं में शास्त्रीयता और दार्शनिकता का गहरा पुट है।
D) ये नाथ पंथ के मूल प्रवर्तक थे और हठयोग के जन्मदाता थे।
उत्तर: D) ये नाथ पंथ के मूल प्रवर्तक थे और हठयोग के जन्मदाता थे।
व्याख्या:
कथन D गलत है, क्योंकि नाथ पंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ (या मत्स्येंद्रनाथ) माने जाते हैं, कण्णपा नहीं। कण्णपा विशुद्ध रूप से एक महान सिद्ध कवि थे। उनके बारे में शेष तीनों कथन बिल्कुल सत्य हैं — वे 84 सिद्धों में सबसे विद्वान और शास्त्रज्ञ कवि थे। उनकी भाषा में एक और जहां पांडित्य झलकता है, वहीं दूसरी ओर सहज साधना की व्याकुलता भी दिखती है।
प्रश्न 11. सिद्ध साहित्य और नाथ साहित्य के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कणी (सेतु) किस कवि को माना जाता है, जो पहले सिद्ध थे और बाद में नाथ बन गए?
A) जालंधरपाद
B) चौरंगीनाथ
C) मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ)
D) गोपीचंद
उत्तर: C) मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ)
व्याख्या:
मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) 84 सिद्धों में भी गिने जाते हैं (मीनपा नाम से) और वे नाथ पंथ के आदि गुरुओं में भी शामिल हैं। वे सिद्धों के वामाचार और भोग विलास की साधना में लिप्त हो गए थे, जिन्हें बाद में उनके महान शिष्य गोरखनाथ ने जगाया और ‘जाग मछंदर गोरख आया’ का नारा देकर नाथ पंथ की स्थापना की, जो पूरी तरह से ब्रह्मचर्य और हठयोग पर आधारित था। अतः मत्स्येंद्रनाथ सिद्ध और नाथ साहित्य के मध्य सेतु हैं।
प्रश्न 12. “बौद्ध गान ओ दोहा” नाम से सिद्धों की रचनाओं का संग्रह 1916 ई. में किसने प्रकाशित करवाया था?
A) डॉ. प्रबोध चंद्र बागची
B) महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री
C) राहुल सांकृत्यायन
D) रामचंद्र शुक्ल
उत्तर: B) महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री
व्याख्या:
सिद्ध साहित्य को आधुनिक काल में सबसे पहले सामने लाने का श्रेय हरप्रसाद शास्त्री को जाता है। उन्होंने नेपाल के राजकीय पुस्तकालय से सिद्धों की कुछ पांडुलिपियां प्राप्त कीं और उनका संपादन करके सन् 1916 में बंगाल की ‘एशियाटिक सोसाइटी’ के माध्यम से ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित कराया। इसकी भाषा को उन्होंने पुरानी बंगाली माना था, जिसे बाद के विद्वानों ने पुरानी हिंदी प्रमाणित किया।
प्रश्न 13. सिद्ध साहित्य की काव्य-शैलियों और छंदों (दोहा और चौपाई का क्रम) का सीधा प्रभाव उत्तरवर्ती काल के किस साहित्य पर सबसे अधिक दिखाई देता है?
A) कृष्ण काव्यधारा
B) सूफी प्रेमाख्यानक काव्यधारा
C) संत काव्यधारा (कबीर आदि)
D) राम भक्ति काव्यधारा
उत्तर: C) संत काव्यधारा (कबीर आदि)
व्याख्या:
सिद्धों की खंडन-मंडन की शैली, बाह्याचारों पर चोट, उलटबांसियां (संधा भाषा का विकसित रूप), और ‘दोहा-चौपाई’ (कड़वक बद्ध) शैली का सीधा और गहरा प्रभाव निर्गुण संत काव्यधारा (विशेषकर कबीरदास) पर पड़ा। कबीर की साखियों में जो रहस्यवाद, गुरु की महिमा और जाति-पांति का विरोध मिलता है, उसकी नींव आदिकाल के सिद्धों और नाथों ने ही रखी थी।
प्रश्न 14. सिद्धों के ‘पंचमकार’ साधना रूप में कौन सा तत्व शामिल नहीं है?
A) मद्य और मांस
B) मत्स्य और मुद्रा
C) मैथुन
D) मंत्र और मोक्ष
उत्तर: D) मंत्र और मोक्ष
व्याख्या:
सिद्धों की वज्रयान साधना में ‘महासुख’ की प्राप्ति के लिए पांच तत्वों को अनिवार्य माना गया था, जिन्हें ‘पंचमकार’ कहा जाता है क्योंकि ये सभी ‘म’ अक्षर से शुरू होते हैं। ये हैं: 1. मद्य (शराब), 2. मांस, 3. मत्स्य (मछली), 4. मुद्रा (साधना के लिए अनाज या विशेष भंगिमा/नारी), और 5. मैथुन (शारीरिक संसर्ग)। इनमें ‘मंत्र और मोक्ष’ शामिल नहीं हैं। यही पंचमकार बाद में सिद्धों के पतन का मुख्य कारण बने।
प्रश्न 15. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में सिद्धों की रचनाओं को किस कोटि में रखकर उन्हें शुद्ध साहित्य की परिधि से बाहर माना है?
A) सांप्रदायिक शिक्षा मात्र (धार्मिक उपदेश)
B) वीरगाथात्मक साहित्य
C) लौकिक श्रृंगार काव्य
D) पौराणिक आख्यान
उत्तर: A) सांप्रदायिक शिक्षा मात्र (धार्मिक उपदेश)
व्याख्या:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य में जीवन की स्वाभाविक अनुभूतियों और लोक-मंगल को महत्व देते थे। उन्होंने सिद्धों और नाथों की रचनाओं को ‘शुद्ध साहित्य’ के अंतर्गत स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि ये रचनाएं केवल अपनी-अपनी धार्मिक धाराओं या संप्रदायों की शिक्षा मात्र हैं, अतः इनका ऐतिहासिक महत्व तो है, परंतु साहित्यिक दृष्टि से इन्हें शुद्ध काव्य नहीं माना जा सकता। हालांकि बाद में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने शुक्ल जी के इस मत का जोरदार खंडन किया।
प्रश्न 16. किस इतिहासकार ने सिद्धों की कृतियों की भाषा को “पुरानी हिंदी” कहते हुए ‘सरहपाद’ को हिंदी का सबसे पहला कवि घोषित किया?
A) शिवसिंह सेंगर
B) मिश्र बंधु
C) राहुल सांकृत्यायन
D) डॉ. रामकुमार वर्मा
उत्तर: C) राहुल सांकृत्यायन
व्याख्या:
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने गहन शोध के उपरांत यह सिद्ध किया कि सिद्धों की भाषा अपभ्रंश से निकलती हुई ‘पुरानी हिंदी’ (अवहट्ट/देशभाषा) है। उन्होंने 8वीं शताब्दी (769 ई.) के सिद्ध सरहपा (सरहपाद) को हिंदी का प्रथम कवि स्वीकार किया। आज हिंदी जगत के अधिकांश विद्वान सर्वसम्मति से सरहपा को ही हिंदी का पहला कवि मानते हैं।
प्रश्न 17. “जहि मन पवन न संचरइ, रवि ससि नाहिं पवेस। तहि बट चित्त बिसाम करु, सरहें कहिउ उवेस।“ — इस पंक्ति में ‘पवन न संचरइ’ और ‘रवि ससि नाहिं पवेस’ का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
A) एक अंधेरी गुफा जहां हवा और सूरज नहीं पहुंच सकते
B) वह यौगिक प्राणायाम अवस्था जहां इड़ा, पिंगला और सांसों का आवागमन रुक जाता है और मन शून्य (सुषुम्ना) में लीन हो जाता है
C) मृत्यु के बाद की स्थिति
D) संसार का विनाश
उत्तर: B) वह यौगिक प्राणायाम अवस्था जहां इड़ा, पिंगला और सांसों का आवागमन रुक जाता है और मन शून्य (सुषुम्ना) में लीन हो जाता है
व्याख्या:
सरहपा की यह पंक्ति अत्यंत उच्च दार्शनिक स्तर की है। यहाँ ‘मन और पवन (सांस)’ का न चलना तथा ‘रवि और ससि’ (सूर्य और चंद्रमा, जो हठयोग में इड़ा और पिंगला नाड़ियों के प्रतीक हैं) का प्रवेश न होना, उस परम शून्य या समाधि की अवस्था को दर्शाता है जहाँ साधक सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ब्रह्मरंध्र में पहुंच जाता है। सरहपा कहते हैं कि वहीं अपने चित्त को विश्राम (विश्राम) दो।
प्रश्न 18. ‘दोहाकोश’ ग्रंथ का संपादन किसने किया था, जिसमें सरहपा, तिलोपा, शांतिपा आदि कई सिद्धों के दोहे संकलित हैं?
A) हरप्रसाद शास्त्री
B) डॉ. प्रबोध चंद्र बागची
C) डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल
D) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
उत्तर: B) डॉ. प्रबोध चंद्र बागची
व्याख्या:
नेपाल और तिब्बत से प्राप्त सिद्धों के दोहों का मूल पाठ तैयार करके डॉ. प्रबोध चंद्र बागची ने ‘दोहाकोश’ नाम से इसका कुशल संपादन और प्रकाशन कराया था। ध्यान रहे, हरप्रसाद शास्त्री ने ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ का संपादन किया था, लेकिन विशिष्ट रूप से ‘दोहाकोश’ के प्रामाणिक संपादन का श्रेय डॉ. बागची को जाता है। डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने नाथों की रचनाओं का संपादन ‘गोरख बानी’ नाम से किया था।
प्रश्न 19. सिद्ध साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों (विशेषताओं) के संबंध में कौन सा युग्म सही है?
A) बाह्याचारों का विरोध, गुरु महिमा, रहस्यवादी अनुभूति, लोकभाषा का प्रयोग
B) वेदों की प्रामाणिकता, क्षत्रिय धर्म का समर्थन, केवल संस्कृत का प्रयोग
C) नारी का पूर्ण त्याग, कठिन उपवास, राजदरबारों की प्रशंसा
D) अहिंसा का घोर विरोध, मूर्ति पूजा का समर्थन, संस्कृत ग्रंथों की रचना
उत्तर: A) बाह्याचारों का विरोध, गुरु महिमा, रहस्यवादी अनुभूति, लोकभाषा का प्रयोग
व्याख्या:
सिद्धों की मुख्य साहित्यिक और धार्मिक प्रवृत्तियाँ थीं: जाति-पांति और वैदिक बाह्याचारों का कड़ा विरोध करना, साधना के मार्ग में गुरु को सर्वोच्च स्थान देना (क्योंकि गुरु ही दीक्षा दे सकता था), संधा भाषा के माध्यम से अपनी रहस्यमयी अनुभूतियों को प्रकट करना, और तत्कालीन जनसामान्य की भाषा (अपभ्रंश मिश्रित पुरानी हिंदी) का प्रयोग करना ताकि उनकी बात सीधे जनता तक पहुंचे। शेष तीनों विकल्प (B, C, D) सिद्धों की विचारधारा के विपरीत हैं।
प्रश्न 20. “सिद्धों का झुकाव सहज साधना की ओर था, उनका हठयोग केवल बाहरी क्रिया नहीं बल्कि आंतरिक सहजता का मार्ग था; परंतु आगे चलकर यही मत जब नाथों में गया तो वह शून्य और संयम प्रधान हो गया।“ यह विश्लेषणात्मक स्थापना किस आधुनिक आलोचक की है?
A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
B) डॉ. नगेंद्र
C) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
D) डॉ. बच्चन सिंह
उत्तर: C) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
व्याख्या:
यह प्रसिद्ध विश्लेषणात्मक मत आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का है। उन्होंने सिद्ध और नाथ साहित्य का बहुत गहरा तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया था। द्विवेदी जी ने स्पष्ट किया कि सिद्ध जहां ‘सहज’ सुख और नारी सहवास के माध्यम से मोक्ष ढूंढ रहे थे, वहीं नाथ संप्रदाय ने कड़ा संयम, ब्रह्मचर्य और हठयोग (प्राणायाम, कुंडलिनी जागरण) अपनाकर सिद्धों के वामाचार का शुद्धिकरण किया। यह हिंदी साहित्य के आदिकाल को समझने का एक मुख्य वैचारिक आधार है।

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